PN संधि डायोड पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में क्या है, कार्यविधि, परिपथ आरेख

वह परिपथ जिसमें दो संधि डायोड का उपयोग करके एक ऐसी परिपथ की व्यवस्था की जाती है जिससे धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों ही अर्ध चक्रों के दौरान निर्गत वोल्टता प्राप्त होती है तब इस प्रकार के परिपथ को पूर्ण तरंग दिष्टकारी कहते हैं।

pn संधि डायोड पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में

पूर्ण तरंग दिष्टकारी में निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दोनों अर्ध चक्रों के दौरान निर्गत धारा प्राप्त होती है। इसमें दो संधि डायोड D1 व D2 के n-फलकों को एक साथ संयोजित किया जाता है। एवं निर्गत वोल्टता को दोनों संधि डायोडो के उभयनिष्ठ बिंदु तथा ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुंडली के मध्य बिंदु के बीच प्राप्त किया जाता है। pn संधि डायोड का पूर्ण तरंग दिष्टकारी परिपथ चित्र में प्रदर्शित किया गया है।

pn संधि डायोड पूर्ण तरंग दिष्टकारी के रूप में

अब जिस प्रत्यावर्ती वोल्टता का दिष्टकरण करना होता है उसे एक उच्चायी ट्रांसफार्मर की प्राथमिक कुंडली के दोनों सिरों से जोड़ देते हैं। ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुंडली के A और B सिरों को दो pn संधि डायोडों D1 व D2 के P सिरों से जोड़ा गया है। तथा इन‌ दोनों pn संधि डायोडों के n-फलकों को एक साथ संयोजित किया जाता है। एवं इन संधि डायोड के उभयनिष्ठ बिंदु तथा तथा ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुंडली के मध्य एक लोड प्रतिरोध RL जोड़ा दिया जाता है। एवं निर्गत वोल्टता को इसी लोड प्रतिरोध के सिरों पर प्राप्त किया जाता है। निवेशी व निर्गत वोल्टता तरंग रूप को चित्र द्वारा स्पष्ट किया गया है।

पूर्ण तरंग दिष्टकारी कार्यविधि

पूर्ण तरंग दिष्टकारी कार्यविधि

निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के पहले अर्ध चक्र में, जब द्वितीयक कुंडली का A सिरा धनात्मक तथा B सिरा ऋणात्मक होता है। तो D1 संधि डायोड अग्र दिशिक होता है और इसमें विद्युत धारा का प्रवाह होता है। एवं लोड प्रतिरोध RL पर निर्गत वोल्टता प्राप्त होती है। जबकि D2 संधि डायोड पश्च दिशिक होता है। और इसमें विद्युत धारा का प्रवाह नहीं होता है। एवं लोड प्रतिरोध RL पर निर्गत वोल्टता शून्य होती है।
इसी प्रकार निवेशी प्रत्यावर्ती वोल्टेज के दूसरे अर्ध चक्र में, जब द्वितीयक कुंडली का A सिरा ऋणात्मक तथा B सिरा धनात्मक होता है। तो D1 संधि डायोड पश्च दिशिक होता है और इसमें विद्युत धारा का प्रवाह नहीं होता है। एवं लोड प्रतिरोध RL पर निर्गत वोल्टता शून्य होती है। जबकि D2 संधि डायोड अग्र दिशिक होता है। और इसमें विद्युत धारा का प्रवाह होता है। एवं लोड प्रतिरोध RL पर निर्गत वोल्टता प्राप्त होती है।

अतः इस प्रकार निर्गत वोल्टता पहले और दूसरे (धनात्मक व ऋणात्मक) दोनों अर्ध चक्रों में प्राप्त होती है। जिस कारण इस परिपथ को पूर्ण तरंग दिष्टकारी कहते हैं। पूर्ण तरंग दिष्टकारी में निर्गत वोल्टता एकदिशिक होती है परंतु इसका मान स्थायी नहीं होता है। जिसे फिल्टर के द्वारा स्थायी वोल्टता में परिवर्तित किया जा सकता है।


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