व्यंजन किसे कहते हैं, भेद, परिभाषा उदाहरण सहित

व्यंजन

जो वर्ण स्वतंत्रता से नहीं बोले जा सकते, अर्थात जिनका उच्चारण करने के लिए स्वरों की सहायता लेनी पड़ती है। उन्हें व्यंजन कहते हैं। प्रत्येक व्यंजन में ‘अ’ स्वर अवश्य मिला होता है।
परंपरागत रूप से व्यंजनों की संख्या 33 मानी जाती है। द्विगुण व्यंजन को जोड़ देने पर इनकी संख्या 35 हो जाती है।

व्यंजन किसे कहते हैं

व्यंजनों का वर्गीकरण

1. स्पर्श व्यंजन

स्पर्श व्यंजनों के पांच वर्ग हैं और प्रत्येक वर्ग में पांच-पांच व्यंजन है। क से में तक स्पर्शी व्यंजन 25 हैं।
क वर्ग → क ख ग घ ड़
च वर्ग → च छ ज झ ञ
ट वर्ग → ट ठ ड ढ ण
त वर्ग → त थ द ध न
प वर्ग → प फ ब भ म

Note → जब व्यंजनों के नीचे हलंत चिन्ह लगता है तब वह व्यंजन आधा माना जाता है।

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कंठ्य व्यंजन

जिन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ के पिछले भाग से कोमल तालु स्पर्श होती है उन्हें कंठ्य व्यंजन कहते हैं।
जैसे – क, ख, ग, घ, ङ

तालव्य व्यंजन

जिन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ का अगला भाग कठोर तालु को स्पर्श करता है, उन्हें तालव्य व्यंजन कहते हैं।
जैसे – च, छ, ज, झ, ञ

मूर्धन्य व्यंजन

तालु (मुंह के भीतर ऊपरी छत का मध्य का भाग) मूर्धा कहलाता है। ऐसी स्थिति से बोले जाने वाली ध्वनि को मूर्धन्य व्यंजन कहते हैं।
जैसे – ट, ठ, ड, ढ, ण

दंत्य व्यंजन

जिनके उच्चारण में जीभ की नोक ऊपरी दांतों को स्पर्श करती है।
जैसे – त, थ, द, ध, न

ओष्ठ्य व्यंजन

जिनके उच्चारण में दोनों ओष्ठों द्वारा श्वास की अवरोध (रुकावट) होती है।
जैसे – प, फ, ब, भ, म

दंन्त्योष्ठ्य व्यंजन

जिनके उच्चारण में दोनों ओष्ठ दांतों को स्पर्श करते हैं।
जैसे –

वत्स्र्य व्यंजन

जिनके उच्चारण में जीभ ऊपरी मसूड़े को स्पर्श करती है।
जैसे – स, र, ल, न

2. प्रयत्न के आधार पर व्यंजन

अनुनासिक या नासिक्य व्यंजन

जिन व्यंजनों के उच्चारण में वायु नाक से निकलती है उन्हें अनुनासिक या नासिक्य व्यंजन कहते हैं।
जैसे – ङ, ञ, ण, न, म

लुंठित व्यंजन

इन व्यंजनों के उच्चारण करने पर जीभ तालु से एकदम लुढ़ककर कंपन करती हुई स्पर्श करती है इसलिए इन्हें प्रकम्पित व्यंजन ध्वनि भी कहते हैं।
जैसे –

उत्क्षिप्त व्यंजन

इन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ पहले ऊपर उठकर झटके से नीचे आ जाती है।
इनकी संख्या दो है – ङ ढ
इन्हें ताणनजात व्यंजन भी कहते हैं।

उष्म व्यंजन

इन व्यंजनों के उच्चारण में एक प्रकार से घर्षण के कारण गर्माहट से वायु बाहर निकलती है। इनकी संख्या चार है – श, स, ष, ह

पार्श्विक व्यंजन

इन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ तालु को छुए, परंतु पार्श्व (बगल) में से हवा निकल जाए।
जैसे –

काकल्य या स्वयंत्रमुखी व्यंजन

इन व्यंजनों के उच्चारण में अंदर से आती हुई श्वास तीव्र गति से स्वर यंत्र पर संघर्ष उत्पन्न करती है।
जैसे –

अंत:स्थ व्यंजन

इन व्यंजनों के उच्चारण में मुख सिकुड़ सा जाता है फिर भी हवा स्वरों की भांति बीच से निकल जाती है। इनकी संख्या चार है – य, र, ल, व
Note → य और व को अर्धस्वर भी कहते हैं।

3. घोषत्व के आधार पर व्यंजन

घोष का अर्थ है स्वतंत्रियों में ध्वनि का कंपन।

अघोष व्यंजन

जिन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में स्वतंत्रियों में कंपन ना हो उन्हें अघोष व्यंजन कहते हैं। प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा व्यंजन जैसे – (क ख), (च छ), (ट ठ), (त थ), (प फ) और (श ष स ) भी अघोष व्यंजन है।

सघोष व्यंजन

जिन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में स्वतंत्रियों में कंपन होता है सघोष या घोष व्यंजन कहलाते हैं।
प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा तथा पांचवा व्यंजन जैसे – (ग घ ङ), (ज झ ञ), (ड ढ ण), (द ध न), (ब भ म), (ङ ढ), तथा (य र ल व ह) सघोष या घोष व्यंजन हैं।

4. प्राणत्व के आधार पर व्यंजन

यहां प्राण का अर्थ हवा (वायु) से है।

1. अल्पप्राण → जिन व्यंजन वर्णों के उच्चारण में मुख से कम वायु निकलती है वे अल्पप्राण व्यंजन होते हैं ।
प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पांचवा व्यंजन अल्प्राण व्यंजन होता है।
(क ग ङ), (च ज ञ), (ट ड ण), (त द न), (प ब म) आदि।

2. महाप्राण → जिन व्यंजन वर्णों के उच्चारण में मुख से अधिक वायु निकले वह महाप्राण व्यंजन वर्ण होते हैं।
प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा व्यंजन वर्ण महाप्राण व्यंजन है।
(ख घ), (छ झ), (ठ ढ), (ढ़ श ष स ह) आदि।

व्यंजन से संबंधित प्रश्न उत्तर

1. व्यंजन किसे कहते हैं?

जिन वर्णों को स्वतंत्र रूप से नहीं बोला जा सकता, उन्हें व्यंजन कहते हैं।

2. 33 व्यंजन कौन-कौन से हैं?

क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह।

3. हिंदी वर्णमाला में कुल कितने व्यंजन होते हैं?

मूलतः रूप से व्यंजनों की संख्या 33 मानी गई है। किन्तु इनमें द्विगुण व्यंजन ड़, ढ़ को मिलाने पर इनकी संख्या 35 हो जाती है। तथा चार संयुक्त व्यंजन क्ष, त्र, ज्ञ, श्र हैं।


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